Saturday, 14 September 2013

क़मर इक़बाल की गज़लें


क़मर इक़बाल 

हर ख़ुशी  मक़बरों पे लिख दी है 
और  उदासी  घरों पे लिख दी है

एक आयत सी दस्त-ए-कुदरत ने
तितलियों के परों पे लिख दी है 

जालियों को तराश कर किस ने
हर दुआ पत्थरों पे लिख दी है 

लोग यूं सर छुपाए फिरते है
जैसे क़ीमत सरों पे लिख दी है

हर वरक़ पर है कितने रंग ' क़मर '
हर ग़ज़ल मंजरों पे लिख दी है
* * *
जीना है सब के साथ कि इंसान मैं भी हूँ
चेहरे बदल बदल के परेशान मैं भी हूँ

झोंका हवा का चुपके से कानों में कह गया
इक काँपते दिए का निगहबान मैं भी हूँ

इंकार अब तुझे भी है मेरी शनाख्त से
लेकिन न भूल ये तेरी पहचान मैं भी हूँ

आँखों में मंज़रों को जब आबाद कर लिया
दिल ने किया ये तंज़ कि वीरान मैं भी हूँ

अपने सिवा किसी से नहीं दुश्मनी ' क़मर '
हर लम्हा ख़ुद से दस्त ओ गरेबान मैं भी हूँ
* * *
ख़ुद की खातिर न ज़माने के लिए ज़िंदा हूँ
कर्ज़ मिट्टी का चुकाने  के लिए ज़िंदा हूँ

किस को फ़ुर्सत जो मिरी बात सुने ज़ख्म गिने
ख़ाक हूँ ख़ाक उड़ाने  के लिए ज़िंदा हूँ

लोग जीने के ग़रज-मंद बहुत है लेकिन
मैं मसीहा को बचाने  के लिए ज़िंदा हूँ

रूह आवारा न भटके ये किसी की ख़ातिर
सरे रिश्तों को भुलाने  के लिए ज़िंदा हूँ

ख़्वाब टूटे हुए रूठे हुए लम्हे वो 'क़मर'
बोझ कितने ही उठाने  के लिए ज़िंदा हूँ
* * *

Saturday, 17 August 2013

किताबें बोलती हैं - 6

मेरा मिट्टी है सरमाया - दिनेश मंज़र


                          - दिनेश मंज़र की गज़लें 

शोर  में  क्या  कहा, सुना  जाए
आज   ख़ामोश   ही  रहा  जाए 

मेरे   हिस्से  की  ख़ुशनुमा नींदें
कौन  हँस-हँस  के छिनता जाए 

भीड़   के   आसपास  हैं  पत्थर
अपना  चेहरा  बचा  लिया जाए

काश ! सपनों को पंख लग जाएँ
आज   की  रात  बस  उड़ा  जाए

          20 जूलाई को मैं देर रात तक़ अपने निजी मुक़द्दमें की फ़िक्र में सो नहीं पाया था ! 4 बजे तक मुझे याद है की मुझे नींद नहीं आई थी ! सुब्ह जल्दी जागने की जरुरत भी नहीं थी, 21 को 11-30 को फोन की रिंग बजी, हल्लो कहा - आवाज आई " आपका पोस्ट का पता दो मै किताब भेजता हूँ मुहतरम अनवारे इस्लाम साहब ने कहा है ! "
          7 अगस्त को डाक से दो किताब मिली ! शायर है दिनेश मंज़र - मेरा मिट्टी है सरमाया ! फोन भी शायर दिनेश मंज़र साहब का ही था ! किताब के पन्ने इधर उधर किये पढ़ हैरान हो गया ! और एक बार पढ़ना शरु किया तो ख़त्म ही कर के छोड़ा ! 3 बार पढ़ चूका हूँ इस किताब को !

मेरी  पूजा  है  किसी  तोतले  बच्चे  जैसी
बोलना मुझको भी अच्छे से सिखाये कोई
* * *
दुख का कोई  साथ न दे
सुख  के  दावेदार बहुत
* * *
एक मेला है यूँ तो अपनों का
चंद  रिश्ते  ही  ख़ास  होते है
* * *
बोलती हैं हर तरफ ख़ामोशियाँ
जब  से  हम  तेरे हवाले हो गये
* * *
बता दो पत्थरों ! सारे नगर को
मैं इक ख़ुश्बू का पैकर ढूंढता हूँ
* * *

          दिनेश मंज़र साहब का मूल नाम दिनेश कुमार सोनी है ! साहब ने राजनीति शास्त्र में स्नातक दिल्ली विश्वविधालय से किया है ! दिनेश मंज़र साहब सहायक लेखा अधिकारी, भारत सरकार,वर्तमान में विदेश मंत्रालय में नियुक्त है ! दिनेश मंज़र साहब के काव्य-गुरु श्री आचार्य सारथी रूमी जी है !
          ग़ज़ल संकलन मेरा मिट्टी है सरमाया में लगभग सौ गज़लें है ! आज के दौर में किसी भी कवि-शायर में सामाजिक और राजनीति की समझ और हालात का लेखा-जोखा करने का हूनर बहुत जरुरी है, जो दिनेश मंज़रजी को सहज प्राप्त हो गया है ! वो जो भी बात करते है बड़ी आसानी से आसान आल्फाज़ों में कह देते है ! कुछ अशआर -

जिनकी झूठी बात भी सच्ची लगती थी
वो   मेरे  सच  को  झुठलाये  फिरते  है
* * *
मैं तो मुन्सिफ़ हूँ, जमाने की नज़र में लेकिन
फ़र्के-इन्साफ़   को  सूली   पे   चढ़ाऊँ   कैसे ?
* * *
आम  लोगों की बेबसी छलकी
आपकी ख़ास - ख़ास शामों में
* * *
तन्ज़ की भाषा में मुझसे गुफ़्तगू करते हैं सब
क्या मेरा अस्तित्व है बस तन्ज़ करने के लिए
* * *
काँपता है ज़मीर क्यूँ मेरा
चंद जलते हुए सवालों से
* * *
मैंने अपने ख़ून से गुलशन सिचां था
तेरे ज़िम्मे  क्यूँ   इसकी रखवाली है
* * *

          दिनेश मंज़र साहब का यें पहला ही ग़ज़ल संग्रह है फिर भी ग़ज़लों के हर एक शे'र कुछ नयेपन से सामने आते है ! जितने सुकून से पढ़ेंगें उतना ही गहेराई में ले जायेगा ! हिन्दी-उर्दू ग़ज़ल पर बात करते समय एक बात स्पस्टता से मानी जा सकती है की समानता की दृष्टी से दोनों भाषाएँ नजदीक है ! ग़ज़ल कहेते वक़्त हिन्दी में उर्दू की मिठास और उर्दू में हिन्दी की शब्दावली का स्वाभाविक रूप से सम्मिश्रण देखा जा सकता है ! मंज़र साहब की ग़ज़लों में दोनों भाषा का प्रभाव है !मुझे यकीं है एक दिन दोनों भाषा के लोग मंज़र साहब पर फक्र करेंगे !लिजियें एक ख़ुबसूरत ग़ज़ल -
ज़िन्दगानी   की   हसीं   शाम अभी बाक़ी है
वक़्त    का     रेशमी   पैग़ाम अभी बाक़ी है

तेरे हिस्से  में तो  फ़ुरसत है ज़माने भर की
मेरे  हिस्से   का  बहुत  काम अभी बाक़ी है

ज़िन्दगी !  पेश क्यूँ आती है  परायों  जैसी
मेरे   होठों   पे   तेरा   नाम   अभी बाक़ी है

मेरी पलकों में छुपी प्यास अभी तक है जवाँ
तेरी   आँखों   का   हसीं  जाम अभी बाक़ी है

तेरे  एहसास  का  'मंज़र'  है   भले  लासानी 
मेरे   ज़ज्बात   का   अन्जाम अभी बाक़ी है
* * *
          दिनेश मंज़र आज के दौर के शायर है वो लाचारी यां मायूसी भरी बाते कम, और उमीद से भरी बातें ही  ज्यादा करते है ! आने वाले कल की एक तस्वीर भी उसकी नजर में है ! साथ ही आज के दौर में जो भी देखा है ग़ज़ल के माध्यम से साफ-साफ लफ़्ज़ों में मुँह पर कह दिया हैं !

मत  पूछिये कि कौन-से मंज़र नज़र में है
टूटे   तमाम  आइने  आँखों   के  घर में है

भूखे  किसी  ग़रीब  का  चर्चा  नहीं  कहीं
ऊँचे घरों के  भोज  भी  देखो  ख़बर में है

हम ख़ुद करेंगे एक दिन ज़ुल्मों का फ़ैसला
जो  कर  रहे  है  ज़ुल्म  हमारी नज़र में है

मैं सोचता  था  ज़िन्दगी आसान  हो  गई
धब्बे  लहू  के  कैसे   मेरी  रहगुज़र में है
* * *
          मंज़र साहब की आँखें आने वाले सुनहरे कल को देखते है ! वर्तमान चाहे जैसा रहा हो वो उम्मीद का दिया जलाये हुयें है ! हौसला और हिम्मत भी देते है !

अगली रुत में शायद मुझको प्यार मिले
ये  मौसम  तो  गम से रिश्ता जोड़ गया
* * *
जब भी देती हैं ठोकरें राहें
मैं और तेज़ दौड़ पड़ता हूँ
* * *
फलक़ से चाँद चुराने की रात आई है
सितारे तोड़ के लाने की रात आई है
* * *
कोई  मेरे  साथ  नहीं  था
पर, मैनें कब हिम्मत हारी?
* * *

          इस किताब से शे'र यां ग़ज़ल चून कर रखना बड़ा मुश्किल काम है ! कितने शे'र ब्लॉग पर रखूँगा !!! फिर भी इस दौर के सियासी माहोल और हालत पर थोड़े शे'र -

अब असली सिक़्क़े हैं ख़ुद पर शर्मिन्दा
नकली सिक्कों ने वो जगह  बना ली है
* * *
सोने के सिक्कों, चाँदी के चम्मच का
क्या लेना, देना  मजदूर, किसानों से

देख  रहे  हैं  'मंज़र'  ख़ूब  तबाही  के
आज के राजा, रानी रोज विमानों से
* * *
          आने वाले वक़्त में दिनेश मंज़र साहब से हमारी उम्मीदे बहुत बढ़ गई है ! भविष्य में जो कुछ भी लिखेंगे वह अधिक परिपक्व, प्रभावशाली और जिंदगी की सच्चाई को पूरी शिद्दत से बयान करेगा ! मैं चाहता हूँ जल्दी एक और किताब का गुलदस्ता हमारे हाथ में दे !

          इस किताब को पाने के लिए ज्यादा तकलीफ नहीं उठानी पड़ेगी आपको -
प्रकाशक   :  आशीष प्रकाशन 
                                    100, देवीमूर्ति कॉलोनि, पानीपत
                        फोन : 09650033037
                     मूल्य : 200/- रुपये 

          दिनेश मंज़र साहब से पूछ कर भी इस अनमोल किताब को पाया जा सकता है ! दिनेश मंज़र साहब को मिलने का फेसबुक लिंक ( Dinesh Soni Manzar ) ! दिनेश मंज़र साहब का फोन नं. 09968898788 है ! आपको ग़ज़लें पसंद आई हो तो मुबारक बाद, बधाई जरुर देना ! जाते जाते दो गज़लों के साथ आलविदा ! कहीं गलती रही हो माफी चाहूँगा !

तू   जो मुझको जबान दे देता
तेरी  ख़ातिर   मैं जान दे देता

मौत से  डर गया था मैं वर्ना
तेरे  हक़  में   बयान दे देता

प्यार की इन्तहा से यूँ गुज़रा
एक  पल  में ये जान दे देता

आदमी  हूँ, ज़मीन  है  मेरी
तू   भले   आसमान दे देता

यार ! 'मंज़र' बदल गया वर्ना
मैं   तुझे   ये  जहान दे देता
* * *
* * *
प्यार के साथ प्यार की बातें
जैसे      रंगो-बहार की बातें

ज़िन्दगी  भर हमें लगी झूठी
ज़िन्दगी  के  क़रार की बातें

कौन जाने कि कैसे आम हुई
राज़   की  राज़दार की बातें

आदमी वक़्त का गुलाम रहा
कौन  करता है हार की बातें

आज मंज़र लगीं उसे प्यारी
बाद  मुद्दत के यार की बातें

Thursday, 1 August 2013

मेगी आसनानी की गज़लें और नज्में

गज़लें और नज्में 


सारे जग से रूठ जाना चाहती हूँ
हा, मगर तुमको मनाना चाहती हूँ

 प्यार की छत हो,दिवारे ऐतबार की
बस मैं ऐसा आशियाना चाहती हूँ

इक खुशी गर तुं जो मुझको दें सके तो
सारे गम को भूल जाना चाहती हूँ

बस तेरा ही प्यार मांगू ज़िन्दगी में
मैं कहा कोई ख़जाना चाहती हूँ

हा, वतन को छोड़ा बरसो हो चूके है
अब मैं लेकिन लौट आना चाहती हूँ

पाया क्या है और खोया क्या है मैंने
सारी बाते भूल जाना चाहती हूँ 
* * *

कुछ इस तरह मजबूर हो ये बात है गलत
तुम मुझसे इतना दूर हो ये बात है गलत

बेख़ुद हुई है दुनिया, चल, संभाल ले इसे
हम भी नशे में चूर हो ये बात है गलत

रुक जाओ मेरे ख़्वाब में कुछ देर के लिए
अब इतने भी मगरूर हो ये बात है गलत

अपनी नज़र पे भी ज़रा सा गौर कीजिये
सब मेरा ही कुसूर हो ये बात है गलत

दिन भर ख़ुदाया एक अँधेरा सही मगर
ये चाँद भी बेनूर हो ये बात है गलत
* * *

रात तो रात है
कैसे ज़ज़्बात है

वो मिले है कहाँ ?
बस मुलाकात है

ज़िन्दगी, प्यार, तुम
सब खयालात है

दिन को छेड़ो ना वो
रात की बात है

ये जहाँ, वो जहाँ
इक तेरी ज़ात है
* * *

-- नज्में --

सुना है मेरे देश में बारिश का मौसम शरु हो गया है
और मैं यहाँ परदेश की गर्मी में
ac में बंद कमरे में,
उम्र की उस एक बारिश के ख़याल से
भीग जाती हूँ
जो अब तक मैनें नहीं देखी ….
* * *
हर रोज़ की तरह आज का सूरज भी नया लगता है
इसकी धीरे धीरे बढ़ती तपिश
हमारे अंग अंग में सुर्ख ताजगी भरती है
की हम अपनी सोच को फैसलों में बदल सके
ठिठुरते हुए अपने प्यार और इंसानियत का हाल बदल सके,
तुम यूँ ख़ामोश, उदास सोते रहोगे तो कुछ नहीं होगा
जो भी करना है हमें ही करना है
इन फूलों में कभी न मिटने वाली ख़ुशबू है
आओ 
हम वफ़ा, इंसानियत, प्यार की ख़ुशबू दूर तक फैला दे….
चलो उठो…
मैं इश्क़ की दरगाह से महोब्बत के फ़ूल लायी हूँ ….
* * *

मैं वो लडकी हु
जो हरपल को जी भर के जी लेती है
न कभी मुड के पीछे देखती है
और न ही कभी
आनेवाले कल के लिए इतना
दूर का सोचती है
अगर आज जब उसने
दूर से सदा दी
अपनी हसती हुई आँखों से पुकारा
प्यार के दो मीठे बोल कहे
तो ये दिल
आनेवाले कल से हिरासां हो गया
और न जाने क्यों
मैं कल के लिए बहूत दूर का सोचने लगी ……  !!!
* * *
मेगीजी का फेसबुक लिंक …. मेगी जी के नाम पर क्लिक करे… 

मेगी आसनानी

Friday, 26 July 2013

मंज़ूर हाशमी की गज़ले

मंज़ूर हाशमी 

मंज़ूर हाशमी 

नई   ज़मीं  न  कोई   आसमान  माँगते  है
 बस एक गोशा-ए-अमन-ओ-अमान  माँगते है

कुछ अब के धूप का ऐसा मिज़ाज बिगड़ा है
दरख्त  भी तो यहाँ  साए-बान  माँगते है

हमें  भी आप से  इक  बात अर्ज़ करना है
पर अपनी जान की पहले अमान  माँगते है

कुबूल कैसे करूँ उनका फैसला कि ये लोग
मिरे  खिलाफ़  ही मेरा  बयान माँगते है

हदफ़ भी मुझ को बनाना है और मेरे हरीफ़ 
मुझी  से  तीर  मुझी से  कमान माँगते है

नई फज़ा  के परिंदे  है कितने  मतवाले
कि बाल-ओ-पर से भी पहले उड़ान माँगते है
* * *
न सुनती है न कहना चाहती है
हवा इक़ राज़ रहना चाहती है

न जाने क्या समाई है कि अब की

नदी हर सम्त बहना चाहती है

सुलगती राह भी वहशत ने चुन ली

सफ़र भी पा बरहना चाहती है

तअल्लुक़ की अजब दीवानगी है

अब उस के दुख भी सहना चाहती है

उजाले की दुआओं की चमक भी

चराग़-ए शब में रहना चाहती है

भँवर में आँधियों में बादबाँ में

हवा मसरुफ़ रहना चाहती है
* * *
सर पर थी कड़ी धूप बस इतना ही नहीं था
उस शहर के पेड़ों में तो साया ही नहीं था

पानी में जरा देर को हलचल तो हुई थी

फिर यूँ था कि जैसे कोई डूबा ही नहीं था

लिख्खे थे सफर पाँव में किस तरह ठहरते

और ये भी कि तुम ने पुकारा ही नहीं था

अपनी ही निगाहों पे भरोसा न रहेगा

तुम इतना बदल जाओगे सोचा ही नहीं था
* * * 
यक़ीन हो तो कोई रास्ता निकलता है
हवा की ओट भी ले कर चराग जलता है

सफ़र में अब के ये तुम थे कि ख़ुश-गुमानी थी

यही लगा की कोई साथ साथ चलता है

लिखूँ वो नाम तो कागज़ पे फूल खिलते है

करूं ख़याल तो पैकर किसी का ढलता है

उम्मीदों ओ यास की रुत आती जाती रहेती है

मगर यक़ीन का मौसम नही बदलता है
मंज़ूर हाशमी 

Sunday, 21 July 2013

किताबें बोलती हैं : 5

मुझ को महसूस कर के देख : सुमन अग्रवाल


ख़ुदारा लाज मेरे बालो-पर की रख देना 
उड़ान पर हूं मैं इज्ज़त सफ़र की रख देना 

कहीं पे रास्ता भटकूं अगर मेरे मौला 
वहीं पे नींव नई रह गुज़र की रख देना 

यही दुआ है,यही इल्तजा है,ए मालिक 
मेरे हर ऐब पे चादर हुनर की रख देना 

न हो कहीं पे भी फ़ाक़ा-कशी की मजबूरी 
सदा ये आन ग़रीबों के घर की रख देना 

न लौट आए वो टकराके आसमानों से 
दुआ जो हाथ पे रखना असर की रख देना 

हर एक रात के हमराह जल रहा हूं 'सुमन'
मेरे चिरागों में कुव्वत सहर की रख देना 

          मेरे गांव के आस-पास के शहरो में किताबें बहुत ही कम मिलती हैं !दोस्त जोगि जसदनवाला के घर कई बार जाने का मौका मिलता है ! जोगि की अपनि बहेतरीन लायब्रेरी है ! एक बार जोगि ने मुजे एक किताब हाथ मे थमा दी थी- मुझ को महसूस कर के देख - शायर है सुमन अगवाल !


मैं बच्चे की तरह मेले में गुम हूँ
कोई आकर मेरा बाजू पकड़ ले 

          ए वही शायर है जिसका जिक्र हम आगे की पोस्ट बोलती है २ मे शायरा रेखा अग्रवाल की किताब यादों का सफर मे हूआ था ! सुमन जी का सारा परिवार साहित्य से जूडा हुवा है ! पत्नि, बेटा, बहू, भाइ सब ! जोगि ने कइ बार सुमन जी क जिक्र करते है कि s.m.s. से उनसे बात होती रहेती है ! इस बात का समर्थन किताब से मिलता है कि सुमन जि s.m.s. के कितने शोखिन है !



          शायर या कवि के ख्याल कभी भी पुराने नहीं होते सदा ही नयें और ताजगी भरे रहेते हैं ! और वहीं शायर  है जो  शायरी में कुछ नयापन लाये जिसे किसी भी दौर में कोई भी पढ़े उसी दौर का लगे ! सुमनजी ऐसे ही शायर है ! जो अपनि ग़ज़लों के कारण अपनि एक अलग पहेचान बना सके है ! 

 पकड़ने को ख़ुशी की एक तितली,
मैं हर ग़म से उलज़ता जा रहा हूँ !

मुझे मंजिल ने ख़ुद आकर कहा  है,
मैं कुछ आगे निकलता जा रहा हूँ ! 


          उर्दू क मशहूर शायर राहत इन्दौरी ने इस किताब में सुमन जी के बारे में और उनकी शायरी के बारे में लिख्खा है :-
          ' सुमन अग्रवाल जी का मजमुए-कलाम-मुजको महसूस कर के देख की सारी गजले प्यारी और दिल को छू लेने वाली है ! ख़ुशी की बात ए है की सुमन अग्रवाल जैसे फ़ितरी और खुशफ़िक्र शायर की मादरी जुबान उर्दू नहीं है, वे उर्दू मै अच्छी शायरी कर रहे है जो उनकी उर्दू अदब से दिलचस्पी का सबूत है ! सुमन साहब की शायरी, सफासत, सादगी, रवानी और फ्सह्तरंगी का बेहतरीन नमूना है ! इस कामयाबी के लिये शायर मुबारकबाद के मुस्ताक हैं। '

          सुमन साहब कि गज़लें पढ़ कर महसूस किया कि सुमन साहब की ग़ज़लों में रवायत की मिठास और नये-पन की चुभन का अहसास इस दर्ज़ा है कि शे'र एक दम नश्तर की तरह सीने में उतर जाते है। सुमन साहब के शे'रों में हालात की गर्मी,ख़यालात की नर्मी और ज़ज्बात की मीठी चुभन का अहसास यकबयक अपने आप झलकने लगता है।

कई हालात के ज्वालामुखी हैं मेरे सीने में
बला की आग से चट्टान कब पानी नहीं होती

जहां पर लहर उठती हैं वहीं गिरदाब होते हैं
अगर चुपचाप हो दरिया तो तुगयानी नहीं होती हैं

          आज के माहौल में स्वार्थ,दोगलापन और मतलब परस्ती पहले से कुछ ज़्यादा है, मौसमों के मिजाज़ भी बदले बदले से है और वातावरण भी काफी नागवार सा होता जा रहा है-ऐसे मुकाम पर शायर की कलम चुप कैसे रह सकती है। टीस भरे अंदाज़ में दुनिया के तजुर्बात और हवादिस को और मजरुह मंज़रो को यूँ पेश किया-

मैं अपने आपसे ख़ुद ही छिपा रहा लेकिन
मेरा वजूद बराबर मेरी तलाश में है
* * *
शराफ़त बाल खोले शहर में अक्सर भटकती है,
हमारे गाँव में तहज़ीब चुटिया गूँथ लेती है।

          शे'रों में नयापन यकीनन इस नए दौर की देन है फिर भी सुमन साहब ने हस्बे ज़रूरत नये ख्यालात, नये ज़ज्बात और नई परवाज़ को रवायत के सांचे से गुजार कर एक नई तकमील को जन्म दिया है। शायरी खूंनेदिल और गुलकारीयों का दूसरा नाम है। किताब में जगह जगह आपको गुलकारी का अहसास तो होगा ही साथ साथ जुबान का मज़ा भी महसूस करने पर मजबूर रहेंगे।

बुढ़ापे में अभी तक भी छिपा मेरा वही बचपन
कहीं से भी मेरे टूटे खिलौने ढूंढ लाता है
* * *
मेरी दो पोतियों में, मेरा बचपन
मेरे कांधे पे चढ़कर, खेलता है
* * *
          ग़ज़ल चाहे किसी भी भाषा में कही जाये, ग़ज़ल ही रहेगी। ग़ज़ल के शेर की दो पंक्तियाँ दोहों की तरह से स्वतंत्र विचार प्रस्तुत करती हैं। सुमन साहब की ग़ज़लों के हर शे'र में यक़ीनन वही ख़ासियत दिखलाय पड़ती है।जैसे हर शे'र का लफ्ज़ कुछ कह रहा हो, जैसे वह मस्ती में कूछ गुनगुना रहा हो या शे'र ताज़ा फूलों की तरह खुशबू बिखेर रहा हो। एसा लगता है कि किताब का हर शे'र कह रहा हो, मुझ को महसूस कर के देख

मेरी तस्वीर को तुम कल से इस कमरे में मत रखना,
मैं यूं लटका हुआ दीवार पर अच्छा नहीं लगता।

हुनर में बदख्याली, बददमागी, बदजुबानी हो,
हुनर कैसा भी हो, ऐसा हुनर अच्छा नहीं लगता।
     उर्दू के एक और मशहूर शायर मुहतरम मुनव्वर राणा साहब किताब में लिखते है की -
     ' ग़ज़ल संग्रह " मुझ को महसूस कर के देख " के सफहात पर सुमन साहब के शे'र नहीं है, उनका तजुर्बा है।उनकी आप बीती है हो जग बीती का दर्द छुपाये हुए है। शायर की आँख,दुनिया का सबसे पुराना कैमरा है। शायर का दिमाग भगवान का बनाया हुआ Computer है। शायर का दिल, दुनिया का सबसे पुराना आबाद इलाका है। एन तीनों Software की मदद से देखे हुए ख्वाब को शायरी कहते है। '
ज़ियादा बहस दीनो धर्म की अच्छी नहीं होती,
 जरा सी बात भी लोगो में झगड़ा डाल देती है 
* * * 
फूंकनी पर है मेरे माँ के लबों की गरमी
घर का चूल्हा इसी गर्मी से सुलगता देखा
* * *
तुम्हारे वास्ते, मुल्के-अदम से आया हूँ
जहाँ से लौट के आना, कोई मज़ाक नही
* * *
कहां पर शौक था मुझको अज़ीज़ों, ख़ुदनुमाई का
मैं अपने आपसे अक्सर, तमाशा हो सा जाता हूँ
* * *
हम इसलिए भी न कोई, ख़ुदा तराश सके
तमाम शहर के पत्थर थे, पत्थरों की तरह
* * *
जो दिल से फूटके निकला था चीख़ की मानिंद
वो मेरे दर्दे मुहब्बत  का, एक नगमा था 
* * *
मुझको महसूस करके देख ज़रा
मैं हवा हूँ कहां नहीं हूँ मैं 
* * *
कुछ तो होते है मुहब्बत में जुनूं के आसार
और कुछ लोग भी दीवाना बना देते है
* * *
          किताब पाने के लिए पता है-
प्रकाशक : सूर्यप्रभा प्रकाशन 
2 /9 , अंसारी रोड, दरियागंज 
नई दिल्ली- 110 002 ( india )

          जाते जाते सुमन जी की एक ग़ज़ल - 

आग से दूर, समंदर में जो घर रखते हैं
वो नजर वाले, हर इक शय पे नज़र रखते हैं

इस तरह मरना यक़ीनन, कोई आसन नहीं 
मरने वाले भी तो, जीने का हुनर रखते हैं

राहे मुश्किल के इरादों का, कोई खौफ नहीं
हौसले वाले अजब अज्मे-सफर रखते है

अपने बारे में हमें कोई ख़बर हो कि न हो
हम मगर सारे जमाने की रखते हैं

अपनी हस्ती पे नहीं जिनको भरोसा ए 'सुमन '
वक़्त के पैरों में, अक्सर वही सर रखते हैं
* * *
          आप सभी से माफी चाहूंगा की ईस पोस्ट में बहोत गलतीयां रही है....क्यु की मेरे गांव में पिछले १० दिन में एक ही परीवार के ७ लोगो की " कोंगो " नामके वाईरस से मोत हुई है....८ लोग अस्पताल में भरती है और सारे ईलाके मे अफरा तफरी मची है फिलहाल स्थिती काबू मे आ गई है लिकीन मैं जा रहा हूं समाज सेवा में ..और किसी की पोस्ट ना पढ पाया , कोमेन्ट न दे पाया तो माफी ....तो पोस्ट जैसी है वैसी पेश है ....

Saturday, 6 July 2013

हुमैरा राहत की ग़ज़लें

हुमैरा राहत 




फ़साना अब कोई अंजाम पाना चाहता है
तअल्लुक टूटने को इक बहाना चाहता है

जहाँ इक शख्स भी मिलता नहीं है चाहने से
वहाँ ये दिल हथेली पर ज़माना चाहता है

मुझे समजा रही है आँख की तहरीर उस की
वो आधे रास्ते से लौट जाना चाहता है

ये लाज़िम है कि आँखे दान कर दे इश्क को वो
जो अपने ख़्वाब की ताबीर पाना चाहता है

बहुत उकता गया है बे-सुकूनी से वो अपनी
समंदर झील के नजदीक आना चाहता है

वो मुझ को आजमाता ही रहा है जिंदगी भर
मगर ये दिल अब उस को आज़माना चाहता है

उसे भी ज़िन्दगी करनी पड़ेगी 'मीर' जेसी
सुखन से गर कोई रिश्ता निभाना चाहता है
* * *
वक़्त ऐसा कोई तुझ पर आए
ख़ुश्क आँखों में समंदर आए

मेरे आँगन में नहीं थी बेरी
फिर भी हर सम्त से पथ्थर आए

रास्ता देख न गोरी उसका
कब कोई शहर में जा कर आए

ज़िक्र सुनती हूँ उजाले का बहुत
उस से कहना कि मिरे घर आए

नाम ले जब भी वफ़ा का कोई
जाने क्यूँ आँख मिरी भर आए
* * * 
हर एक ख़्वाब की ताबीर थोड़ी होती है
मोहब्बतों की ये तक़दीर थोड़ी होती है

कभी कभी तो जुदा बे-सबब भी होते है

सदा ज़माने की तकसीर थोड़ी होती है

पलक पे ठहरे हुए अश्क से कहा मै ने

हर एक दर्द की तशहीर थोड़ी होती है

सफ़र ये करते है इक दिल से दुसरे दिल तक

दुखों के पाँव में ज़ंजीर थोड़ी होती है

दुआ को हाथ उठाओ तो ध्यान में रखना 

हर एक लफ़्ज़ में तासीर थोड़ी होती है
* * *
किसी भी राएगानी से बड़ा है
ये दुःख तो ज़िंदगानी से बड़ा है

न हम से इश्क़ का मफ़हूम पूछो
ये लफ़्ज़ अपने मआनी से बड़ा है

हमारी आँख का ये एक आँसू
तुम्हारी राजधानी से बड़ा है

गुज़र जायेगी सारी रात इस में
मिरा कीस्सा कहानी से बड़ा है

तिरा ख़ामोश सा इज़हार 'राहत'
किसी की लन-तरानी से बड़ा है

- हुमैरा राहत 

Sunday, 30 June 2013

वज़ीर आग़ा की ग़ज़लें


वज़ीर आग़ा 


लुटा कर हमने पत्तों के ख़ज़ाने
हवाओं से सुने क़िस्से पुराने

खिलौने बर्फ़ के क्यूं बन गये हैं
तुम्हारी आंख में अश्कों के दाने

चलो अच्छा हुआ बादल तो बरसा
जलाया था बहुत उस बेवफ़ा ने

ये मेरी सोचती आँखे कि जिनमे
गुज़रते ही नहीं गुज़रे ज़माने

बिगड़ना एक पल में उसकी आदत
लगीं सदियां हमें जिसको मनाने

हवा के साथ निकलूंगा सफ़र को
जो दी मुहलत मुझे मेरे ख़ुदा ने

सरे-मिज़गा वो देखो जल उठे हैं
दिये जितने बुझाये थे हवा ने 

- वज़ीर आग़ा 


बारिश हुई तो धुल के सबुकसार हो गये
आंधी  चली  तो रेत की दीवार हो गये

रहवारे-शब के साथ चले तो पियादा-पा

वो लोग ख़ुद  भी सूरते-रहवार हो गये

सोचा ये था कि हम भी बनाएंगे उसका नक़्श

देखा उसे तो नक़्श-ब-दीवार हो गये

क़दमों के सैले-तुन्द से अब रास्ता बनाओ

नक्शों के सब रिवाज तो बेकार हो गये

लाज़िम नहीं कि तुमसे ही पहुंचे हमें गज़न्द

ख़ुद हम भी अपने दर-पये-आज़ार हो गये

फूटी सहर तो छींटे उड़े दूर-दूर तक

चेहरे तमाम शहर के गुलनार हो गये

- वज़ीर आग़ा 


सावन का महीना हो

हर बूंद नगीना हो

क़ूफ़ा हो ज़बां उसकी

दिल मेरा मदीना हो

आवाज़ समंदर हो

और लफ़्ज़ सफ़ीना हो

मौजों के थपेड़े हों

पत्थर मिरा सीना हो

ख़्वाबों में फ़क़त आना

क्यूं उसका करीना हो

आते हो नज़र सब को

कहते हो, दफ़ीना हो

- वज़ीर आग़ा