Saturday, 6 July 2013

हुमैरा राहत की ग़ज़लें

हुमैरा राहत 




फ़साना अब कोई अंजाम पाना चाहता है
तअल्लुक टूटने को इक बहाना चाहता है

जहाँ इक शख्स भी मिलता नहीं है चाहने से
वहाँ ये दिल हथेली पर ज़माना चाहता है

मुझे समजा रही है आँख की तहरीर उस की
वो आधे रास्ते से लौट जाना चाहता है

ये लाज़िम है कि आँखे दान कर दे इश्क को वो
जो अपने ख़्वाब की ताबीर पाना चाहता है

बहुत उकता गया है बे-सुकूनी से वो अपनी
समंदर झील के नजदीक आना चाहता है

वो मुझ को आजमाता ही रहा है जिंदगी भर
मगर ये दिल अब उस को आज़माना चाहता है

उसे भी ज़िन्दगी करनी पड़ेगी 'मीर' जेसी
सुखन से गर कोई रिश्ता निभाना चाहता है
* * *
वक़्त ऐसा कोई तुझ पर आए
ख़ुश्क आँखों में समंदर आए

मेरे आँगन में नहीं थी बेरी
फिर भी हर सम्त से पथ्थर आए

रास्ता देख न गोरी उसका
कब कोई शहर में जा कर आए

ज़िक्र सुनती हूँ उजाले का बहुत
उस से कहना कि मिरे घर आए

नाम ले जब भी वफ़ा का कोई
जाने क्यूँ आँख मिरी भर आए
* * * 
हर एक ख़्वाब की ताबीर थोड़ी होती है
मोहब्बतों की ये तक़दीर थोड़ी होती है

कभी कभी तो जुदा बे-सबब भी होते है

सदा ज़माने की तकसीर थोड़ी होती है

पलक पे ठहरे हुए अश्क से कहा मै ने

हर एक दर्द की तशहीर थोड़ी होती है

सफ़र ये करते है इक दिल से दुसरे दिल तक

दुखों के पाँव में ज़ंजीर थोड़ी होती है

दुआ को हाथ उठाओ तो ध्यान में रखना 

हर एक लफ़्ज़ में तासीर थोड़ी होती है
* * *
किसी भी राएगानी से बड़ा है
ये दुःख तो ज़िंदगानी से बड़ा है

न हम से इश्क़ का मफ़हूम पूछो
ये लफ़्ज़ अपने मआनी से बड़ा है

हमारी आँख का ये एक आँसू
तुम्हारी राजधानी से बड़ा है

गुज़र जायेगी सारी रात इस में
मिरा कीस्सा कहानी से बड़ा है

तिरा ख़ामोश सा इज़हार 'राहत'
किसी की लन-तरानी से बड़ा है

- हुमैरा राहत 

Sunday, 30 June 2013

वज़ीर आग़ा की ग़ज़लें


वज़ीर आग़ा 


लुटा कर हमने पत्तों के ख़ज़ाने
हवाओं से सुने क़िस्से पुराने

खिलौने बर्फ़ के क्यूं बन गये हैं
तुम्हारी आंख में अश्कों के दाने

चलो अच्छा हुआ बादल तो बरसा
जलाया था बहुत उस बेवफ़ा ने

ये मेरी सोचती आँखे कि जिनमे
गुज़रते ही नहीं गुज़रे ज़माने

बिगड़ना एक पल में उसकी आदत
लगीं सदियां हमें जिसको मनाने

हवा के साथ निकलूंगा सफ़र को
जो दी मुहलत मुझे मेरे ख़ुदा ने

सरे-मिज़गा वो देखो जल उठे हैं
दिये जितने बुझाये थे हवा ने 

- वज़ीर आग़ा 


बारिश हुई तो धुल के सबुकसार हो गये
आंधी  चली  तो रेत की दीवार हो गये

रहवारे-शब के साथ चले तो पियादा-पा

वो लोग ख़ुद  भी सूरते-रहवार हो गये

सोचा ये था कि हम भी बनाएंगे उसका नक़्श

देखा उसे तो नक़्श-ब-दीवार हो गये

क़दमों के सैले-तुन्द से अब रास्ता बनाओ

नक्शों के सब रिवाज तो बेकार हो गये

लाज़िम नहीं कि तुमसे ही पहुंचे हमें गज़न्द

ख़ुद हम भी अपने दर-पये-आज़ार हो गये

फूटी सहर तो छींटे उड़े दूर-दूर तक

चेहरे तमाम शहर के गुलनार हो गये

- वज़ीर आग़ा 


सावन का महीना हो

हर बूंद नगीना हो

क़ूफ़ा हो ज़बां उसकी

दिल मेरा मदीना हो

आवाज़ समंदर हो

और लफ़्ज़ सफ़ीना हो

मौजों के थपेड़े हों

पत्थर मिरा सीना हो

ख़्वाबों में फ़क़त आना

क्यूं उसका करीना हो

आते हो नज़र सब को

कहते हो, दफ़ीना हो

- वज़ीर आग़ा 

Sunday, 23 June 2013

किताबें बोलती है : 4


मिज़ाज़ कैसा है : अनवारे इस्लाम


बात करती हुई ग़ज़लों की किताब 


सूर तुलसी हों, मीरो ग़ालिब हों
सब मेरा खानदान है बाबा 
* * *
आज मैंने मना लिया उसको
मान जाएगा अब खुदा मेरा 
* * *
जो मस्जिद जा रहे है उनसे कह दो
कोई बच्चा अभी तक रो रहा है 

कोई खिड़की नहा गई होगी,
धूप कमरे में आ गई होगी।

जब वो आँगन में आ गई होगी,
चाँदनी तो लजा गई होगी।

मेरे हिस्से की नींद ग़ायब है,
उसकी नींदों में आ गई होगी।

शाम चहरा बिगाड़ बैठी है,
राह में धूप खा गई होगी।

ज़ख्म ख़ुद ही कुरेदता है वो,
लज़्ज़ते दर्द भा गई होगी।
* * *
          मोहतरम अनवारे इस्लाम साहब से कभी मिला नहीं हूँ पर फोन पर अकसर बातें होती है। पहेली बार मिलाने का , बात कराने का श्रेय जाता है असलम मीर को। फिर गूगल से मिले नीरज जी, और पढली साहब की किताबों की दुनिया फिर तो मेने भी ब्लॉग बनाया। फिर अनवारे इस्लाम साहब से बात की और किताब मांगली या यु कहो परेशान कर के ली। 
          शायर होना बहोत बड़ी बात है पर उससे भी बड़ी बात है एक बहोत बड़ा इन्सान होना।  मोहतरम अनवारे इस्लाम साहब वो शख्सियत है की आप से जो एक बार बात करता है साहब का हो जाता है। थोड़े दिन गुजरे नहीं की फोन आया नहीं। हिन्दी-उर्दू का द्वैमासिक सुखनवर सालो से चला रहे है। ऐ बहोत बड़ी सिध्धि है।

ऐसा हो कोई काम के पहचान बन सके
दुनिया की दास्ताँ से हटाकर रखे जिसे 
* * *
हम फ़रिश्ते नहीं है इन्सां हैं
रोज़ जीते है रोज़ मरते हैं 
* * *
          मेरा प्रयास समीक्षा नहीं है क्यूं की में न तो ईतना ग़ज़ल के बहर के बारे में जानता हूँ न वज़न के बारे में और न तो शाइरी के शिल्प और अरुज़े फ़िक्रो-फ़न के बारे में। मैं तो सिर्फ ग़ज़ल को महसूस करता हूँ। तो पेश है किताब के कुछ अंश।
          मोहतरम अनवारे इस्लाम साहब ने सामाजिक एकाकीपन, माहौल का दबाव और असुरक्षा को देखा और महसूस किया है तभी वो लिखते है -

लोग ऐसी मिसाल देते हैं,
नेकी दरया में डाल देते हैं।

राम बन जायेगा किसी दिन तू,

तुझको घर से निकाल  देते हैं।

आ करें हार-जीत को आसाँ,

एक सिक्का उछाल देते हैं।

घर जो लौटूँ तो फिर सवाल उसके,

और उल्जन में डाल देते हैं।

कोई घटना हो मीडिया कर्मी,

सारी ख़बरे उबाल देते हैं।

कोई उत्तर नहीं मगर चहरे,

कितने सारे सवाल देते हैं।
          

          मोहतरम अनवारे इस्लाम साहबने 'इसरो' भारत शासन और म.प्र. शासन के लिए धारावाहक एवं टेली फ़िल्में भी लिखी है,बाल साहित्य पर अनेकों तथा साक्षरता साहित्य पर 65 पुस्तकें प्रकाशित हैं। और ए भी बता दूँ कि उनकी अनुवादित पुस्तकों की संख्या भी 40 के लगभग है। 
          अनवारे इस्लाम साहब सम्पादक, पत्रकार और सामाजिक विचारधारा से जुड़े है और इसी लिए उनकी ग़ज़लों में ए प्रभाव साफ दिखाय देता है -

यूं तो होने को क्या नहीं होता
तुमसे मेरा भला नहीं होता 

सारा झगड़ा फ़क़त अना का है,
वर्ना कुछ मसअला नहीं होता 

भाई, भाई का साथ देता है
और कोई सगा नहीं होता 

सुहबतों से मिजाज़ बनता है
कोई अच्छा-बुरा नहीं होता

कौन करता है फ़ैसले मेरे
मुझको कुछ भी पता नहीं होता

खा न जाना फ़रेब चहरों से
इनपे सब कुछ लिखा नहीं होता 

            सीधी-सादी और सरल भाषा में अनवारे इस्लाम साहब अपनी बात कहेते है और साथ में मीर और निदा की  तरह ख़याल  पर शिल्प  को हावी  न होने देने के हामी है। उनकी गज़लें बयान और कथ्य की प्रगाढ़ता पर अधिक केन्द्रित है और शब्दों की कारीगरी में उनकी अधिक रूचि नहीं हैं।

नहीं आए हैं इसमें दाग लेकिन
मिरी चादर पुरानी हो रही है 
* * *
सच को छुपा के तूने किसी को बचा लिया
तेरा ये जूठ बोलना अच्छा लगा मुझे
* * *
याद रखते जो तुझको ख़ुशियों में
ज़िन्दगी यूँ दुखी नहीं होती
* * *
इसको तूफ़ान ही सँभालेंगे
नाव तो छोड़ दी है पानी में
* * *
काम से फुर्सत मिली न उम्र भर
और नहीं मालूम क्या करता रहा
* * *
उसकी आँखों में आ गए आँसू
मैंने पूछा मिज़ाज़ कैसा है
* * *
नये मौसमों की ये सौगात होंगे
मिलें ज़ख्म जो भी मुहब्बत से रखना

          इस किताब से कौन सी गज़ल पेश करू !!!कौन सा शेर !!!! पूरी किताब लाज़वाब है।

किताबें तुम्हारी महकती रहेंगी
हमारे ख़तों को हिफ़ाज़त से रखना
* * *
मैं लफ़्ज़ों में ख़ुद को समेटूँ तो कैसे
वो सुनना मिरी दास्ताँ चाहते हैं
* * *
जाने कितना रुलाएँगी ग़ज़लें मिरी
जाने किस-किस की पल्कें भिगो जाउँगा


          मिज़ाज़ कैसा है के शेर सिर्फ शेर नहीं है यह एक दस्तावेज भी है। अगर आप और हम इसकी तफसील में उतरना चाहते है तो मुहतरम अनवारे इस्लाम की तखलीक 'मिज़ाज़ कैसा है ' से गुजर जाइये-इस किताब को पढ़ते वक़्त हम कभी एक सहरा से गुजतें है जहाँ बिखरी उम्मीदों की रेत चमकती है। एक वीराने से गुजर जायेंगे जहाँ ख़ुलूस की खुश्बू सिर्फ खुद के ज़ज्बे के सिवा कहीं और से नहीं हासिल होती और आप बिलाशक़ एक मक्तल से गुज़र जायेंगे। उम्मीदों के बंधे हाथ बेहिसी की सूली पर वक़्त के हाथों अपना सर कलम होने का इंतजार कर रहे है।शाईर ने अपनी ज़हानत और शाईस्तगी पूरे सफ़र के दौरान बरकरार रखी है।

तल्ख गर ज़िन्दगी नहीं होती 
शाईरी, शाईरी नहीं होती 

हम न तुझको तलाश कर पाते
हाँ अगर बेख़ुदी नहीं होती

हमने केवल खुदा को पूजा है 
गैर की बन्दगी नहीं होती 

मुस्कुराके जवाब दे देते 
मुझको शर्मिंन्दगी नहीं होती 


          अनवारे इस्लाम साहब ने अपने कुछ पसंदीदा अल्फाज़ से कमाल के अशआर तख्लिक़ किये है। मिसाल के तौर पर उडान,अँधेरा,उजाला,कश्ती,परिन्दा आदी ............ हम चूनते है "घर"-

है मुश्किल पिता जी के घर को बचाना
मिरे भाई अपना मकाँ चाहते है
* * *
घर में तो मिरे कोई सामान नहीं है
ग़ालिब की ग़ज़ल मीर का दीवान नहीं है
* * * 
बारिशें पत्थरों की हम पर थीं
लोग महफ़ूज़ कांच-घर में थे
* * *
एक घर था बड़ा सा यहाँ पर कभी
छोटे-छोटे कई इसमें घर हो गए
* * *
बस ये उम्मीद लेकर गुजर जाएँगे
लौटकर हम कभी अपने घर जाएँगे
* * *
घर में रख दे तमाम नैतिकता
जैसा करते है लोग वैसा कर
* * *
बैठ पाया नहीं कभी घर में
कट गई उम्र आने-जाने में
* * *
लेके उम्मीदे निकलता हूँ मैं क्या-क्या घर से
रंग उड़ जाता है जब शाम को घर जाता हूँ
* * *
जाने क्या-क्या जमा किया घर में
और समझता रहा ये मेरा है
* * *
कई कमरे हैं उसके पास लेकिन
वो घर में एक कोना चाहता है
* * *
आँखों में मेरी झांक के अंदर भी देख ले
देखा है सिर्फ मुझको मिरा घर भी देख ले
* * *
अजनबी हो गए दरो-दीवार
घर के अन्दर भी घर नहीं लगता
* * *
क्या-क्या न एक झोंके से पल में बिखर गया
मैं मुत्मईन था खूब के सब कुछ तो घर में है
* * *
वो आए मिरे घर में हैं, क्या पूछना मेरा
मैं भी बहुत अच्छा मिरा महमान भी अच्छा 

          इस किताब को पाना बहुत आसान है-
प्रकाशक : आलेख प्रकाशन 
वी-8, नवीन शाहदरा
दिल्ली-110032

          अनवारे इस्लाम साहब से फेसबुक पर मिलने का लिंक 
मोबाइल : 09893663536

            अनवारे इस्लाम साहब का इ-मेल पता 

          सुखनवर के लिए पत्र व्यवहार -
सी-16, सम्राट कोलोनी अशोक गार्डन, भोपाल-462023
मोबाइल : 09893663536
ई-मेल : sukhanwar12@gmail.com

          मेरी पोस्ट से कहीं बेहतर पोस्ट पढने के लिए और किताब के बारे में ज्यादा जानने के लिए निचे दी गयी लिंक पर क्लिक करे -

जाते जाते अनवारे इस्लाम साहब की कुछ गज़लें -

हवा के साथ चरागों ने दोस्ती कर ली
अजीब लोग हैं घबरा के ख़ुदकुशी कर ली

बहुत फ़रेब है रिश्तों में चाँद सूरज के
उज़ाले माँग के लोगो ने रोशनी कर ली

दिलों के मामलें कैसे दिमाग समझेंगे
इसी गुमान में किस-किस से दुश्मनी कर ली

गुज़ार दी शबे तारीक गीत गा-गाकर
दिलों में दर्द लिए हमने ज़िन्दगी कर ली

चलो के टूट गया तेज़ धूप का जादू
लहू बखेर के सूरज ने ख़ुदकुशी कर ली
* * *
झूठ बोला है किस सफाई से
ऐसी उम्मीद थी न भाई से

इतना कहते हुए झिझक कैसी
काम बिगड़े भी है भलाई से

बात घर की है घर में रहने दे
फ़ायदा क्या है जग हंसाई से

बरकतें ही न घर की उड़ जाएँ
बचके रहिए ग़लत कमाई से

मोड़ आने लगा कहानी में
रोक दे दास्ताँ सफ़ाई से

सूद में क़िस्त जाती रहती है
अस्ल चुकता नहीं अदाई से
* * *
सगे भाई हैं उनमें प्यार भी है
मगर आँगन में इक दीवार भी है 

बहुत मासूम है चहरा किसी का
नहीं लगता के दुनियादार भी है

बहुत सी खूबियाँ है उसमें लेकिन
कमी बस ये के वो खुद्दार भी है

वो छुप-छुपकर जो साजिश कर रहा है
वो मेरा ख़ास रिश्तेदार भी है

चलो उस पेड़ को पानी पिला दें
ज़ईफ़ुल-उम्र सायादार भी है

वो करता है बहुत से कम फिर भी
हक़ीक़त ये के वो बेकार भी है

( मुझसे कोइ गलती रही हो तो माफी चाहता हूँ  )

Friday, 7 June 2013

अमजद इस्लाम अमजद की गज़लें

अमजद इस्लाम अमजद




तुम से बिछड़ कर पहरों सोचता रहता हूँ 
अब में क्यूँ और किस की खातिर ज़िंदा हूँ 

मेरी सोचें बदलती जा रही हैं 

के यह चीजें बदलती जा रही हैं 

तमाशा एक है रोज़-ए-अज़ल से 

फ़क़त आँखें बदलती जा रही हैं

बदलते मंज़रों के आईने में

तेरी यादें बदलती जा रही हैं

दिलों से जोडती थी जो दिलों को

वोह सब रस्में बदलती जा रही हैं

न जाने क्यों मुझे लगता है अमजद

के वो नजरें बदलती जा रही हैं


हमें तो वो बोहत अच्छे लगे हैं 
न जाने हम उन्हें केसे लगे हैं 

तो क्या यह पर निकलने का है मौसम
हवा मैं जाल से खुलने लगे हैं

नए कातिल का इस्तकबाल है क्या 
पुराने ज़ख़्म क्यों भरने लगे हैं

अजब है यह तलिस्स्म हम-जुबानी
पराये लोग भी अपने लगे हैं 

दिलों का भेद अल्लाह जनता है 
बजाहिर आदमी अच्छे लगे हैं
चलेगी यह परेशानी कहाँ तक 
बता ए घर की वीरानी कहाँ तक 

बहोत लम्बी थी अब के, खुश्क'साली 
बरसता आंख से पानी कहाँ तक 

तेरे टूटे हुए गजरों के होते 
महेकती रात की रानी कहाँ तक 

रुकेगी कब तलक साँसों में खुशबु 
उड़ेगा रंग यह धानी कहाँ तक 

खिलौना है इसे तो टूटना है 
करें दिल की निगेहबानी कहाँ तक 

उसे बादल बुलाते है हमेशा 
समंदर मैं रहे पानी कहाँ तक 

आज यूँ मुस्कुरा के आये हो 
जेसे सब कुछ भुला के आये हो 

यह निशानी है दिल के लगने की 
यह जो तुम आज जा के आये हो 

क्यूँ झपकती नहीं मेरी आँखें 
चांदनी में नहा के आये हो 

दिल समंदर में चाँद सा उतरा 
केसी खुशबु लगा के आये हो 

क्या बहाना बना के जाना है 
क्या बहाना बना के आये हो 

आ गये हो तो आओ, बिस्मिल्लाह 
देर, लेकिन लगा के आये हो 


चाँद के साथ कई दर्द पुराने निकले 
कितने ग़म थे जो तेरे ग़म के बहाने निकले 

फ़स्ले-ए-गुल आई फिर इक बार असीरान-ए-वफ़ा 
अपने ही खून के दरया में नहाने निकले 

दिल ने इक ईंट से  तामीर किया ताज-महल 
तूने इक बात कही लाख फ़साने निकले 

दश्ते-ए-तनहाई-ए-हिज्राँ में खड़ा सोचता हूँ 
हाय क्या लोग मेरा साथ निभाने निकले
.......
कहाँ आ के रुकने थे रास्ते कहाँ मोड़ था उसे भूल जा
वो जो मिल गया उसे याद रख जो नही मिला उसे भूल जा

वो तेरे नसीब की बारिशें किसी और छत पे बरस गई
दिल-ए-बेखबर मेरी बात सुन उसे भूल जा उसे भूल जा 

मैं तो गुम था तेरे ही ध्यान में तेरी आस में तेरे गुमान में
हवा कह गई मेरे कान में मेरे साथ आ उसे भूल जा

तुझे चाँद बन के मिला था जो तेरे साहिलों पे खिला था जो 
वो था एक दरिया विसाल का सो उतर गया उसे भूल जा 

Saturday, 1 June 2013

निदा फ़ाज़ली की ग़ज़लें

निदा फ़ाज़ली 

निदा फ़ाज़ली

गरज बरस प्यासी धरती पर पानी दे मौला
चिड़ियों को दाने,बच्चों को गुडधानी दे मौला

दो और दो का जोड़ हंमेशा चार कहां होता है
सोच समजवालों को थोड़ी नादानी दे मौला

फिर रोशन कर ज़हर का प्याला चमका नई सलीबें
झुठों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला

फिर मूरत से बाहर आकर चारो ओर बिखर जा
फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला

तेरे होते कोई किसी की जान का दुश्मन क्यों हैं
जीने वालों को मरने की आसानी दे मौला

* * * * *

अब ख़ुशी है न कोई ग़म रुलाने वाला
हमने अपना लिया हर रंग ज़माने वाला

हर बे-चेहरा सी उम्मीद है चेहरा चेहरा

जिस तरफ़ देखिये आने को है आने वाला

उसको रुखसत तो किया था मुझे मालूम न था

सारा घर ले गया घर छोड़ के जाने वाला

दूर के चाँद को ढूँढ़ो न किसी आंचल में

ये उजाला नहीं आँगन में समाने वाला

इक मुसाफ़िर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया

कोई जल्दी में कोई देर में जाने वाला


अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफर के हम हैं
रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता हैं
अपने ही घर में किसी दुसरे घर के हम है

वक़्त के साथ है मिट्टी का सफर सदियों से 
किसको मालूम है कहाँ के किधर के हम हैं

चलते रहते है की चलना है मुसाफ़िर का नसीब
सोचते रहते है कि किस रहगुज़र के हम हैं

Sunday, 26 May 2013

अहमद फ़राज़

 अहमद फ़राज़ की ग़ज़लें 



अगर तुम्हारी ही आन का हैं सवाल 
चलो मैं हाथ बढ़ाता हूँ दोस्ती के लिए 
- अहमद फराज़ 


शोला था जल-बुझा हूँ हवायें मुझे न दो
मैं कब का जा चूका हूँ सदायें मुझे न दो

जो ज़हर पी चूका हूँ तुम्हीं ने मुझे दिया 

अब तुम तो ज़िन्दगी की दुआयें मुझे न दो

ऐसा कभी न हो के पलटकर न आ सकूं 

हर बार दूर जा के सदायें मुझे न दो

कब मुझ को एतराफ़-ए-मुहब्बत न था फराज़ 

कब मैंने ये कहा था सज़ायें मुझे न दो


सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते-जाते 
वरना इतने तो मरासिम थे की आते-जाते 

शिकवा-ए-जुल्मते-शब से तो कहीं बेहतर था 
अपने हिस्से की शमअ जलाते जाते 

कितना आसाँ था तेरे हिज्र में मरना जाना 
फिर भी इक उम्र लगी जाते-जाते 

उसकी वो जाने, पास-ए-वफा था की न था
तुम फराज़ अपनी तरफ से तो निभाते जाते 


जिंदगी से यही गिला है मुझे 
तू बहुत देर से मिला है मुझे 

हमसफ़र चाहिये हुजूम नहीं 
इक मुसाफ़िर भी काफ़िला है मुझे 

तू महोब्बत से कोई चाल तो चल 
हार जाने का हौंसला है मुझे 

लब कुशा हूं तो इस यकिन के साथ 
क़त्ल होने का हौंसला है मुझे 

दिल धड़कता नहीं सुलगता है 
वो जो ख्वाहिश थी,आबला है मुझे 

कौन जाने कि चाहतो में फराज़ 
क्या गंवाया है क्या मिला है मुझे 


किताबों में मेरे फ़साने ढूँढते हैं 
नादाँ हैं गुजरे जमाने ढूँढते हैं 

जब वो थे तलाशे-जिंदगी भी थी 
अब तो मौत के ठिकाने ढूँढते हैं 

मुसाफ़िर बे-खबर हैं तेरी आँखों से 
तेरे शहर में मैखाने ढूँढते हैं 

तुझे क्या पता ऐ सितम ढाने वाले 
हम तो रोने के बहाने ढूँढते हैं 

उनकी आँखों को यूं न देखो फराज़ 
नये तीर हैं, निशाने ढूँढते हैं 


इस से पहले की बेवफ़ा हो जाएँ 
क्यूं न ए दोस्त हम जुदा हो जाएँ 

तू भी हीरे से बन गया पत्थर
हम भी जाने क्या से क्या हो जाएँ

हम भी मजबूरियों का उज्र करें
फिर कहीं और मुब्तिला हो जाएँ

अब के गर तू मिले तो हम तुझसे

ऐसे लिपटे तेरी क़बा हो जाएँ

बंदगी हमने छोड़ दी फराज़
क्या करे लोग जब ख़ुदा हो जाएँ 
-अहमद फ़राज़

अहमद फ़राज़ और नूर जहाँ